सवाल

क्या पूछते हो इस रेगिस्तान से, येः तो सिर्फ बालू हैं, सिर्फ बालू, जहाँ तक नज़र जाए वहाँ तक, न देखि हैं इस्ने बारिश की हसीन बूँदें, और न शाम कि गुदगुदाती हवयें, येः तो सिर्फ सूरज के कोप में जलीं हैं और रात कि तनहाइयों में मुस्कुराईं हैं। अगर पूछना ही हैं, तो पूछ…

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ख़ामोशी

  दूर इन भीड़ भरे रास्तों से, निकल पड़े एक दिन, ढूँढने खोए हुए कुछ खामोश लम्हों को, लेकिन नादान थे हम, के निकल पड़े थे हुजूम के साथ, ढूँढने जिन लम्हों को, और मिल पाये उन लम्हों से, सिर्फ, जब खो पाये साथ निकली भीड़ को| इन तन्हा लम्हों में एक मोहब्बत हैं, जो…

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